पोराणिक हिंदूओ की 8 शंकाओं का समाधान - Solution of 8 doubts of mythical Hindus

पोराणिक हिंदूओ की शंकाओं का समाधान


Where is God?

हम अक्सर जो टीवी, न्यूज या समाज से लोगों से पौराणिक बातें सुनते और देखते हैं और विश्वास भी कर लेते हैं किन्तु जरा भी विवेक और बुद्धि का प्रयोग करके ये समझने की कोशिश नहीं करते कि क्या वे सब बातें कितनी प्रामाणिक और सत्य हैं. आज हम ऐसी आठ शंकाओं को कुछ प्रश्न और उनके उत्तर के माध्यम से समझने कि कोशिश करेंगे. तो चलिए जानते हैं :-

(1) प्रश्न : - क्या रावण के दस सिर थे ?
उत्तर : - नहीं रावण 4 वेदों और 6 शास्त्रों का विद्वान् था. तो जिसके कारण उसको दस दिमाग वाला दशानन कहा जाता था. तो इसी कारण 4 + 6 = 10, उसको दशानन कहा जाता है. जिसका अर्थ दस सिर कदापि नहीं है.

(2) प्रश्नः - क्या हनुमान जी बंदर थे ? और उनकी पूँछ भी थी ?
उत्तर : - नहीं वे मनुष्य थे. क्योंकि जिस जाती के वे थे वह वानर जाती कहलाती है. और जैसे भील नामक जाती थी वैसे ही वानर भी थी. वानर का तात्पर्य बंदर कभी नहीं होता. और पूँछ वाली बात तुलसी कृत रामचरितमानस में आती है. वाल्मीकि रामायण में ऐसी गप्पें नहीं हैं. आजकल जो TV serial रामायण पर बनते हैं वे भी तुलसी की रामचरितमानस के आधार पर बनते हैं. जिसके कारण लोगों के मनों में यह पूँछ वाले हनुमान जी बैठ गये हैं. अपनी गदा लेकर ! और serial बनाने वालों से पूछना चाहिये कि जिन वानरों को आप TV में बंदर मुखी दिखाते हो, तो उनकी स्त्रियों को वैसा क्यों नहीं दिखाते ? क्यों वे मानवी ही होती हैं ? क्यों नहीं उनके भी पूँछ और बंदर का मुख होता ?

(3) प्रश्नः - क्या कृष्ण गोपियों से क्रीड़ा करते थे ? और जब वे तालाब में नहातीं तो वे उनके कपड़े ले भागते थे ?
उत्तर : - नहीं, कृष्ण का जन्म होते ही वह कुछ वर्ष अपनी प्रथम आया के वहाँ रहे. करीब 6 वर्ष तक वह वृदावन में खेलते कूदते रहे. और फिर अवनंतिकापुरी में सांदिपनी के गुरुकुल में भेजा गया. तो वह 30 वर्ष की आयु तक विद्या प्राप्त करके वापिस आये और आकर उनको मथुरा में जनसंघ की स्थापना करनी थी, कंस का चक्रव्यूह तोड़ कर. तो उसके पश्चात् वे कौरवों और पांडवों के झगड़े मिटाने को हस्तिनापुर और विदेह आदि राज्यों के चक्कर काटते रहे. तो यह रास रचाने और कपडे उठाने का समय उनको कब मिला ? यह झूठी भागवत हैं.

(4) प्रश्न : - क्या ब्रह्मा के चार मुख थे ?
उत्तर : - नहीं, ब्रह्मा का एक ही मुख था. चारों वेदों के प्रकाण्ड विद्वान् कहा जाता था, यानी कि चारों ओर से ज्ञानी जिसको चतुर्मुखी कहा जाता था. तो ब्रह्मा एक उपाधि थी. कई ब्रह्मा सृष्टि की आदि से ले कर अब तक हो गये हैं. और उनके एक ही मुँह था.

God

(5) प्रश्न : - क्या विष्णु के चार भुजायें थीं ?
उत्तर : - नहीं ! विष्णु नामक कोई काल्पनिक ईश्वर नहीं है, जिसको आप चित्रों में देखते हो. विष्णु निराकार ईश्वर का ही एक नाम है.

(6) प्रश्न : - क्या गणेश का मुँह हाथी का था ?
उत्तर : - हाथी के बच्चे का मुँह इतना चौड़ा होता है कि उसका भार एक छोटे बच्चे का शरीर कैसे सम्भालेगा ? अरे उस हाथी के सिर और मनुष्य के बच्चे का तो व्यास ( Diameter ) ही आपस में मेल नहीं खायेगा ? और जैसा कि शिव पुराण की कथा में आता है कि शिवजी ने क्रोध में गणेश का सिर काट दिया, तो फिर वो हाथी के बच्चे का ही शरीर क्यों ढूंढने दौड़े ? उन्होंने वही अपने पुत्र का मनुष्य का कटा हुआ सिर क्यों नहीं लगाया ? ये सब मिथ्या और अप्रामाणिक बाते हैं.

(7) प्रश्न : - क्या राम और कृष्ण ईश्वर या ईश्वर के अवतार थे ?
उत्तर : - नहीं ! ईश्वर शरीर में नहीं आता. वह निराकार है. हम जानते हैं कि कोई पदार्थ जब परिवर्तित होता है तो वह अपनी पहली वाली अवस्था से या तो बेहतर होता है या कम ? तो अगर ईश्वर का अवतार मानें तो क्या वह पहले से बेहतर हुआ ? अगर हाँ तो क्या वह पहले पूर्ण नहीं था ? तो फिर सृष्टि को कैसे रचता ? और यदि पहले से उसकी शक्ति कम हुई तो यह भी दोष की बात है. दूसरी बात यह है कि ईश्वर निराकार है और अनन्त शक्ति वाला. पर मनुष्य सीमित शक्ति वाला है. अवतार केवल जीवों का होता है जिसके पुनर्जन्म कहते हैं. ईश्वर का अवतार कभी नहीं होता.

स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के नियम ३ व ४ में लिखा है की -
3. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है. वेद का पढना – पढाना और सुनना – सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है.
4. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये.
आओ सभी मिथ्या ग्रंथों (पुराणो आदि ) को छोड़ कर वेद की ओर लोट चले.

दोस्तों पौराणिक हिंदुओं में जो भ्रांतियां और शंकाए रहती हैं उन्हें दूर करने के लिए वेद, गीता और स्त्यार्थ प्रकाश जैसी धार्मिक पुस्तकों को पढ़ना चाहिए. इस पोस्ट को अपने वॉट्सएप, फेसबुक और ट्विटर आदि पर ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें ताकि सभी की शंकाओं को दूर किया जा सके.

       ॥ ओ३म् ॥
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